विवाह होने में देरी के ज्योतिषीय कारण…..

आज के समय में बहुत से युवक-युवतियाँ विवाह में अनावश्यक देरी को लेकर चिंतित रहते हैं। कई बार सभी प्रयासों के बावजूद भी विवाह तय नहीं हो पाता। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इसके पीछे कुछ प्रमुख ग्रह योग और दोष जिम्मेदार होते हैं।

1️⃣ मंगल दोष (मांगलिक दोष)

यदि जन्मकुंडली में मंगल प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में स्थित हो, तो उसे मांगलिक दोष कहा जाता है।

➡️ यह दोष विवाह में देरी, कलह या बाधा उत्पन्न कर सकता है।

➡️ विशेष रूप से तब प्रभाव बढ़ जाता है जब मंगल पाप ग्रहों से युत या दृष्ट हो।

2️⃣ गुरु (बृहस्पति) की कमजोर स्थिति

गुरु विवाह, दांपत्य और स्त्री कुंडली में पति का कारक ग्रह माना जाता है।

➡️ यदि गुरु नीच का हो, अस्त हो या छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो,

➡️ अथवा पाप ग्रहों से पीड़ित हो,

तो विवाह में विलंब या बार-बार रिश्ते टूटने की स्थिति बनती है।

3️⃣ शुक्र की कमजोरी

शुक्र प्रेम, आकर्षण, विवाह और वैवाहिक सुख का मुख्य कारक है।

➡️ शुक्र यदि नीच का, अस्त, शत्रु राशि में हो या राहु-केतु / शनि से पीड़ित हो,

➡️ तो विवाह में देरी, मनमुटाव या संबंधों में असंतोष देखने को मिलता है।

4️⃣ शनि का प्रभाव

शनि को देरी और परीक्षा का ग्रह कहा जाता है।

➡️ यदि शनि की दृष्टि या युति सप्तम भाव, सप्तम भाव के स्वामी या शुक्र पर हो,

➡️ तो विवाह सामान्यतः देर से होता है, कई बार 30–35 वर्ष के बाद।

➡️ शनि कर्म के अनुसार फल देता है, इसलिए धैर्य की परीक्षा लेता है।

5️⃣ राहु और केतु का प्रभाव

राहु और केतु यदि सप्तम भाव, उसके स्वामी या शुक्र/गुरु से संबंध बनाएं तो

➡️ विवाह में अचानक रुकावट, भ्रम, अस्थिर रिश्ते

➡️ या सामाजिक/पारिवारिक विरोध की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

6️⃣ सप्तम भाव एवं दशा का अभाव

➡️ सप्तम भाव और उसके स्वामी पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव

➡️ तथा विवाह कारक ग्रहों की अनुकूल महादशा / अंतर्दशा का न होना

भी विवाह में देरी का एक प्रमुख कारण है।

✨ निष्कर्ष

विवाह में देरी हमेशा दुर्भाग्य नहीं होती, बल्कि यह ग्रहों के समय चक्र और कर्मफल का परिणाम होती है।

✔️ सही समय पर कुंडली विश्लेषण

✔️ उचित ग्रह शांति एवं उपाय

✔️ और धैर्य

से विवाह संबंधी बाधाओं को काफी हद तक दूर किया जा सकता है।

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