वैदिक ज्योतिष में विवाह केवल दाम्पत्य सुख का साथ ही नहीं बल्कि जीवनसाथी से आपके भाग्य, आर्थिक उन्नति एवं सामाजिक प्रतिष्ठा में कितना सहयोगी सिद्ध होगा ये मायने रखता है। जन्मकुंडली में कुछ विशेष ग्रह योग उपस्थित हों, तो पति या पत्नी विवाह के बाद भाग्योदय का कारण बनते हैं तथा जीवन में उत्तरोत्तर प्रगति देखने को मिलती सकती है, आज इसी सम्बन्ध में जानकारी देने का विचार है।
🔹 धन भाव एवं लाभ भाव का संबंध सप्तम भाव से हो = विवाह के बाद आर्थिक स्थिति में सुधार तथा आय के नए स्रोत प्रदान करते हैं।
🔹 राजयोग या धनयोग में सप्तमेश की भागीदारी = सप्तमेश किसी राजयोग या धनयोग का भाग हो, तो जीवनसाथी सफलता और प्रतिष्ठा बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
🔹 सप्तम भाव एवं सप्तमेश बलवान होना = सप्तम भाव के स्वामी शुभ स्थिति में, उच्च राशि, स्वराशि या केंद्र-त्रिकोण में स्थित हो तो जीवनसाथी सहयोगी एवं प्रगति कराने वाला हो सकता है।
🔹 नवम भाव एवं नवमेश का संबंध सप्तम भाव से होना = नवमेश और सप्तमेश में शुभ संबंध हो तो विवाह के बाद भाग्योदय एवं उन्नति के अवसर बढ़ते हैं।
🔹 गुरु एवं शुक्र का शुभ प्रभाव = जातक की कुंडली में शुक्र तथा जातकी के कुंडली में गुरु शुभ एवं बलवान हो तो योग्य एवं सहायक जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।
🔹 सप्तम भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि = गुरु, शुक्र या शुभ बुध की दृष्टि सप्तम भाव या सप्तमेश पर हो तो जीवनसाथी से आर्थिक, मानसिक एवं सामाजिक सहयोग प्राप्त होता है।
निष्कर्ष :::: सप्तम भाव, नवम भाव, द्वितीय भाव एवं एकादश भाव पर शुभ गृह प्रभाव हो एवं सप्तमेश बलवान हो, पति या पत्नी जीवन में भाग्योदय, आर्थिक उन्नति एवं निरंतर प्रगति के महत्वपूर्ण कारण बनते हैं। ऐसे जातकों को विवाह के बाद जीवन में नए अवसर, सम्मान और समृद्धि प्राप्त होने की संभावना अधिक रहती है।
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ज्योतिषाचार्य रवि भास्कर
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