वैवाहिक जीवन – दाम्पत्य सुख में बाधा क्यों आती है?

जातक/जातिका के जीवन में वैवाहिक सुख हो, दाम्पत्य जीवन सुखी एवं सम्पन्नता के साथ चलता रहे – यह सभी लोगों की इच्छा होती है। किन्तु जन्म के समय ग्रहों की स्थिति तथा लग्न चक्र के अनुसार ग्रहों का प्रभाव दाम्पत्य जीवन पर भी पड़ता है। कुछ ग्रह एवं योग ऐसे होते हैं जिनके कारण वैवाहिक जीवन में खटास, तनाव तथा मतभेद उत्पन्न हो सकते हैं। कई बार दाम्पत्य जीवन बिखर भी सकता है और जातक/जातिका का जीवन शान्तिपूर्वक व्यतीत नहीं हो पाता।

जन्मकुण्डली का सप्तम भाव जीवनसाथी तथा वैवाहिक सुख का प्रमुख भाव माना जाता है। इसी भाव से दाम्पत्य जीवन की स्थिति, सुख-दुःख एवं वैवाहिक संबंधों का आकलन किया जाता है।

दाम्पत्य जीवन में बाधा उत्पन्न करने वाले प्रमुख ज्योतिषीय योग

◆ जन्मकुण्डली का सप्तम भाव का स्वामी (सप्तमेश) यदि षष्ठ, अष्टम अथवा द्वादश भाव में स्थित हो तो वैवाहिक जीवन में खटास एवं तनाव उत्पन्न कर सकता है।

◆ सप्तमेश यदि केतु के साथ युति में हो अथवा केतु से प्रभावित हो तो दाम्पत्य जीवन में बाधाएँ आती हैं।

◆ सप्तमेश यदि पाप ग्रहों के साथ युति करे अथवा उनकी दृष्टि में हो तो वैवाहिक सुख में कमी आती है।

◆ सप्तमेश यदि नीच राशि में हो अथवा पाप ग्रहों से प्रभावित हो तो वैवाहिक जीवन में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

◆ सप्तम भाव में शनि और मंगल की युति हो अथवा दोनों की दृष्टि सप्तम भाव पर हो तो दाम्पत्य जीवन कलहपूर्ण हो सकता है।

◆ सप्तम भाव में सूर्य एवं चन्द्रमा साथ हों तथा शुक्र भी वहाँ स्थित हो, अथवा सूर्य-चन्द्र अमावस्या योग में हों, तो वैवाहिक जीवन में बाधाएँ बनी रह सकती हैं।

◆ सप्तमेश और लग्नेश यदि षष्ठ भाव में युति करें तो दाम्पत्य सुख में कमी आ सकती है।

◆ सप्तमेश यदि वक्री, अस्त अथवा मृत अवस्था में हो तो वैवाहिक जीवन में तनाव एवं असंतोष की स्थिति बन सकती है।

◆ शुक्र यदि छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव में स्थित हो तो दाम्पत्य जीवन कष्टप्रद हो सकता है।

◆ सप्तम भाव का स्वामी यदि केतु के नक्षत्र में स्थित हो तो वैवाहिक जीवन में परेशानियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

◆ सप्तम भाव में शत्रु राशि अथवा नीच राशि का मंगल स्थित हो तथा उस पर सूर्य की दृष्टि हो, तो दाम्पत्य जीवन में सुख की कमी रहती है।

◆ जन्मकुण्डली में ग्रहों का आपसी तालमेल न होना अथवा गण दोष भी वैवाहिक जीवन में खटास ला सकता है।

◆ वर एवं वधू की कुण्डलियों के लग्नों में परस्पर मैत्री का अभाव हो तथा षडाष्टक योग बन रहा हो, तो वैवाहिक जीवन प्रभावित हो सकता है।

◆ शनि और चन्द्रमा की युति सप्तम भाव में होने पर भी दाम्पत्य जीवन में बाधाएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

◆ सूर्य-राहु की युति सप्तम भाव में हो अथवा सप्तमेश सूर्य-राहु से प्रभावित हो तो वैवाहिक जीवन कष्टदायक हो सकता है।

◆ सप्तमेश नवांश कुण्डली में नीच राशि का हो, शत्रु ग्रहों से युक्त हो अथवा शनि-मंगल से प्रभावित हो, तो दाम्पत्य जीवन में संघर्ष बढ़ सकता है।

उपरोक्त ग्रह स्थितियाँ एवं योग जन्मकुण्डली में होने पर वैवाहिक जीवन में तनाव, मतभेद, खटास तथा कभी-कभी अलगाव की स्थिति भी उत्पन्न कर सकते हैं। अतः विवाह से पूर्व एवं वैवाहिक समस्याओं के समाधान हेतु अनुभवी ज्योतिषी से परामर्श लेना लाभकारी हो सकता है।

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हस्तरेखा, जन्मकुण्डली एवं वास्तुशास्त्र परामर्श

आचार्य रवि रंजन भास्कर
गया, बिहार

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