विवाह से पहले लोग गुण मिलान कराते हैं। 36 के 36 गुण मिल जाने पर भी कई बार कुछ समय बाद पति-पत्नी के बीच विवाद बढ़ते-बढ़ते तलाक तक की नौबत आ जाती है। इसलिए केवल गुण मिल जाना ही सुखी वैवाहिक जीवन की गारंटी नहीं होता। इस बात को समझना बहुत जरूरी है।
हमारे पास ऐसे अनेक मामले आए हैं जहाँ लोगों ने कहा – “सर, गुण मिलने के बाद भी वैवाहिक जीवन में व्यवधान आ गया है, तलाक का केस हो गया है, इसे कैसे बचाया जाए?”
मैं सभी लोगों से कहना चाहता हूँ कि गुण मिलान के साथ-साथ संपूर्ण जन्मकुंडली का विश्लेषण किसी योग्य ज्योतिषी से अवश्य कराएँ।
केवल गुण मिलान क्यों पर्याप्त नहीं?
गुण मिलान जन्म नक्षत्रों की सारणी पर आधारित होता है। इसमें 36, 32 या 30 गुण मिलने पर भी दांपत्य जीवन में परेशानी आ सकती है, जबकि कई बार 18 से कम गुण मिलने पर भी पति-पत्नी सुखी रहते हैं।
इसलिए दार्शनिक और व्यवहारिक दृष्टि से निम्न भावों का गहन अध्ययन अधिक महत्वपूर्ण है:
- प्रथम भाव व लग्नेश
- द्वितीय भाव व सुखेश
- पंचम भाव व पंचमेश
- सप्तम भाव व सप्तमेश
- अष्टम भाव व अष्टमेश
- द्वादश भाव व द्वादशेश
भावों का महत्व
प्रथम भाव से व्यक्ति की मानसिकता, स्वभाव और जीवन दृष्टि देखी जाती है। यदि दोनों की सोच मेल न खाए तो मतभेद बढ़ते हैं।
द्वितीय भाव से पसंद-नापसंद, परिवार और भौतिक आवश्यकताओं का विचार किया जाता है।
पंचम भाव प्रेम, आकर्षण, व्यवहार, रोमांस, संतान तथा करियर की दिशा बताता है। धार्मिक प्रवृत्ति भी यहीं से देखी जाती है। यदि एक आस्तिक और दूसरा नास्तिक हो तो जीवन कठिन हो सकता है।
सप्तम भाव दांपत्य, सामंजस्य, सहनशीलता और आपसी प्रेम का मुख्य आधार है।
अष्टम भाव दांपत्य निकटता, गूढ़ संबंध और वैवाहिक स्थिरता से जुड़ा है। इसमें कमी होने पर व्यक्ति असंतोष महसूस कर सकता है।
द्वादश भाव शारीरिक सुख, निजी व्यवहार और भौतिक रुचियों को दर्शाता है। असंतुलन होने पर विवाहेतर आकर्षण की संभावना बढ़ती है।
नवमांश और सप्तमांश का महत्व
नवमांश कुंडली से विवाह के बाद का जीवन, जीवनसाथी का सहयोग और रिश्ते का टिकाव देखा जाता है।
सप्तमांश कुंडली से दांपत्य भागीदारी और संतान सुख का विचार किया जाता है।
निष्कर्ष
इन सभी बातों का सार यही है कि केवल गुण मिलान से अधिक महत्वपूर्ण है दोनों की कुंडलियों का गहन विश्लेषण। यदि एक कुंडली में दांपत्य सुख है और दूसरी में नहीं, तो पूर्ण सुख मिल पाना कठिन हो जाता है।
इसलिए बिना विधिवत कुंडली परीक्षण के विवाह तय न करें।
यदि किसी विशेष दोष की स्थिति हो तो योग्य विद्वान की सलाह से विष्णु विवाह, कुंभ विवाह, वट सावित्री विवाह जैसे वैदिक उपाय कराना लाभकारी हो सकता है।
वैवाहिक जीवन में खटास या तलाक की स्थिति हो तो
ऐसी परिस्थिति में दशमहाविद्या तथा कात्यायनी स्तोत्र का पाठ अत्यंत प्रभावी माना गया है। अनेक लोगों ने इसका लाभ प्राप्त किया है।
हस्तरेखाविद, ज्योतिषविद एवं वास्तुशास्त्र विशेषज्ञ
आचार्य रवि रंजन भास्कर
गया, बिहार
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