अंतर्जातीय विवाह, बेमेल विवाह – जन्मकुंडली से जानें विवाह योग….

आज के परिवेश में युवक-युवतियाँ सुखद एवं सुकूनभरा जीवन जीना पसंद करते हैं। उन्हें लगता है कि यदि वे अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करें तो जीवन सुखी एवं संपन्न रहेगा। कई बार उनकी पसंद अंतर्जातीय होती है।

वहीं दूसरी ओर अनेक परिवारों को ऐसे निर्णयों के कारण कठिन परिस्थितियों का सामना भी करना पड़ता है। युवा वर्ग के अनेक लड़के-लड़कियों को देखा गया है कि उन्होंने विवाह का निर्णय लिया, विवाह भी कर लिया, किंतु बाद में अलग हो गए। इसलिए जीवनसाथी को भली-भांति समझना, परिवार के साथ तालमेल बनाना तथा परिवार एवं मित्रों की राय लेना आवश्यक है।

विवाह कोई खेल नहीं है, यह बार-बार नहीं होता। अतः किसी से प्रेम विवाह अथवा अंतर्जातीय विवाह करने का निर्णय सोच-समझकर ही लेना चाहिए। आज हम कुछ ऐसे ज्योतिषीय योगों की चर्चा करेंगे जिनसे जन्मकुंडली में परंपरागत मान्यताओं से हटकर विवाह अथवा अंतर्जातीय विवाह के संकेत प्राप्त होते हैं।

अंतर्जातीय विवाह योग के संयोग

◆ जन्मकुंडली में लग्न या चंद्र से नवम भाव अथवा नवमेश पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो, नवमेश नीच राशि में स्थित हो अथवा अशुभ भाव में स्थित हो, तो जातक धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताओं को तोड़कर प्रेम विवाह कर सकता है तथा माता-पिता एवं गुरु की आज्ञा की अवहेलना कर सकता है।

◆ पंचमेश, सप्तमेश तथा नवमेश किसी भी भाव में एक साथ युति कर रहे हों अथवा तीनों में दृष्टि संबंध या राशि परिवर्तन योग हो, तो प्रेम विवाह की संभावना बनती है।

◆ राहु यदि शनि या शुक्र के साथ स्थित हो अथवा शुक्र पर राहु एवं शनि की दृष्टि पड़ रही हो, तो जातक वासना के वशीभूत होकर संबंध स्थापित कर सकता है।

◆ शुक्र का संबंध लग्न, पंचम अथवा सप्तम भाव से हो तथा एकादशेश या एकादश भाव का संबंध पंचम अथवा सप्तम भाव से बन रहा हो, तो प्रेम विवाह की संभावना प्रबल होती है।

◆ जन्मकुंडली में शुक्र एवं बुध सप्तम भाव में अंशानुसार अत्यंत समीप हों, तो विवाह पारंपरिक रीति से न होकर अलग प्रकार से हो सकता है।

◆ जन्मकुंडली में प्रेम विवाह के योग बन रहे हों तथा नवम भाव, नवमेश एवं गुरु पाप ग्रहों से प्रभावित हों या नवम भाव पापकर्तरी योग में हो, तो अंतर्जातीय अथवा अन्य धर्म में विवाह की संभावना बनती है।

◆ शनि, मंगल, राहु, केतु अथवा सूर्य का नवम भाव पर प्रभाव हो अथवा नवमेश छठे, आठवें या द्वादश भाव में स्थित हो, तो अंतर्जातीय विवाह का योग बन सकता है।

◆ जन्मकुंडली में शुक्र एवं चंद्र पंचम भाव में स्थित हों, तो अंतर्जातीय विवाह की संभावना देखी गई है।

◆ राहु पंचम भाव में स्थित हो, तब भी अंतर्जातीय विवाह की संभावना बनती है।

◆ शुक्र चतुर्थ भाव में स्थित हो, तो वैवाहिक जीवन में अशांति रह सकती है तथा दांपत्य जीवन में दूरी अथवा अलगाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

◆ पंचमेश मंगल एवं शनि के साथ स्थित हो तथा सप्तमेश दूसरे अथवा एकादश भाव में स्थित हो, तो प्रेम विवाह की संभावना बनती है।

बेमेल विवाह के योग

◆ जन्मकुंडली में चंद्रमा के साथ शनि स्थित हो, तो जातक मानसिक तनाव में आकर बेमेल संबंध बना सकता है।

◆ पंचम भाव प्रेम संबंधों का भी कारक माना जाता है। यदि पंचमेश द्वादश भाव में स्थित हो, तो अंतर्जातीय विवाह अथवा बेमेल विवाह के योग बन सकते हैं।

◆ पंचम भाव में शुक्र एवं शनि की युति हो, तो जातक अपने कर्तव्य को समझता है, किंतु पाप ग्रहों के प्रभाव से संबंधों में बाधाएँ आ सकती हैं।

◆ सूर्य यदि अपनी नीच राशि तुला में स्थित हो, तो जातक परंपराओं का त्याग कर असामान्य निर्णय ले सकता है।

◆ चंद्र एवं मंगल पंचम भाव में युति करें, तो संबंध प्रायः कामुकता के प्रभाव में बनते हैं। बुध एवं राहु भी पंचम भाव में हों, तो मानसिक अस्थिरता के कारण संबंध बन सकते हैं।

◆ द्वितीयेश एवं सप्तमेश का किसी भी प्रकार का संबंध हो, तो प्रेम विवाह पहले से परिचित व्यक्ति से हो सकता है।

◆ पुरुष की कुंडली में शुक्र तथा स्त्री की कुंडली में मंगल कामेच्छा के प्रमुख ग्रह माने गए हैं। स्त्री की जन्मकुंडली में मंगल पर गोचर का राहु या शनि प्रभाव डाले, तो किसी पुरुष से संबंध स्थापित होने की संभावना बन सकती है।

◆ मंगल का संबंध पंचम भाव, पंचमेश, लग्न अथवा लग्नेश से हो, तो प्रेम संबंध स्थापित होने की संभावना रहती है।

◆ सप्तमेश, शुक्र अथवा शनि यदि केतु के साथ स्थित हों, तो प्रेम संबंध गुप्त रह सकते हैं। केतु से प्रभावित शुक्र अथवा सप्तमेश गोपनीयता बनाए रखते हैं।

◆ शुक्र पर शनि एवं राहु दोनों का प्रभाव हो तथा द्वादश भाव भी पाप ग्रहों से प्रभावित हो, तो जातक वासना के प्रभाव में रह सकता है।

◆ कर्क राशि में शुक्र एवं राहु की युति होने पर भावुकतावश जातक या जातिका असामान्य कदम उठा सकते हैं।

◆ बुध राहु के साथ स्थित हो, तो मानसिक अस्थिरता के कारण जातक परंपराओं का पालन नहीं करता।

◆ चंद्रमा सप्तम भाव में हो, तो मानसिक चंचलता अथवा अस्थिरता के कारण ऐसा हो सकता है। सप्तम भाव में धनु राशि का चंद्रमा परंपराओं के उल्लंघन की प्रवृत्ति दे सकता है।

◆ अष्टमेश पंचम भाव में स्थित हो, तो बेमेल संबंध बनने की संभावना रहती है।

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ज्योतिषाचार्य रवि भास्कर
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