ज्योतिष शास्त्र में द्वि-भार्या योग जातक/ जातिका के जीवन में दो विवाह होने की संभावना को द्वि-भार्या योग कहते हैं, ये योग को देखकर निष्कर्ष पर नहीं जाना चाहिए। पूर्णतः कुंडली विश्लेषण से सब कुछ बताया जा सकता है।
इस तरह का प्रभाव जीवन होने के संकेत –
=== सप्तम भाव का पीड़ित होना, सप्तम भाव में पाप ग्रह (शनि, मंगल, राहु, केतु) का प्रभाव, सप्तमेश नीच का होना, अस्त या पाप ग्रहों से ग्रस्त होना, राहु का सप्तम भाव में होना या सप्तमेश से संबंध बनाना वैवाहिक अस्थिरता का कारण बन सकता है।
=== द्वितीय भाव का प्रभावित होना, द्वितीय भाव परिवार की निरंतरता दर्शाता है। इसके स्वामी या भाव के पीड़ित होने पर वैवाहिक जीवन में बाधा आ सकती है।
=== शुक्र का अशुभ प्रभाव में होना, पुरुष की कुंडली में शुक्र तथा स्त्री की कुंडली में गुरु का विशेष महत्व है, शुक्र पर राहु, शनि या मंगल का तीव्र प्रभाव वैवाहिक जटिलताओं को बढ़ा सकता है।
=== नवांश कुंडली का प्रभाव, जन्मकुंडली के साथ नवांश में भी सप्तम भाव, सप्तमेश या विवाह कारक ग्रह प्रभावित हों तो संभावना मजबूत होती है।
=== एक से अधिक ग्रहों का सप्तम भाव से संबंध, कुछ प्राचीन ग्रंथों में सप्तम भाव में अनेक ग्रहों की स्थिति या सप्तमेश का द्विस्वभाव राशि (मिथुन, कन्या, धनु, मीन) में होना भी एक से अधिक वैवाहिक संबंधों का संकेत माना गया है।
विशेष संकेत ::: द्वि-भार्या योग होने का अर्थ यह नहीं है कि दो विवाह निश्चित रूप से होंगे, वर्तमान समय में यह योग कई बार निम्न रूपों में भी फलित हो सकता है—
विवाह टूटने के बाद पुनर्विवाह, लंबे समय तक वैवाहिक तनाव, विवाहेतर आकर्षण, अलगाव के बाद नया संबंध
विशेष निर्णय के लिए जन्मकुंडली, नवांश, दशा-अंतर्दशा तथा गोचर का संयुक्त विश्लेषण करना होगा।
=== ऑनलाइन सुविधा ===
ज्योतिषाचार्य रवि भास्कर
हस्तरेखाविद, ज्योतिषविद एवं वास्तुशास्त्र विशेषज्ञ
भास्कर ज्योतिष अनुसंधान केंद्र, गया जी, बिहार
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Website : www.astrologerbhaskarjyotish.com
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